AartiGyan | 04 January 2026
बाली प्रतिपदा का पर्व हर वर्ष दीपावली के बाद मनाया जाता है। यह उत्सव विशेष रूप से भगवान विष्णु के भक्तों द्वारा धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन, लोग अपने घरों को सजाते हैं और एक-दूसरे को शुभकामनाएँ देते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि बाली प्रतिपदा के पीछे एक अद्भुत कथा छिपी हुई है?
किसी समय की बात है, जब दैत्यों का राजा बलि, अपने पराक्रम और शक्ति के लिए प्रसिद्ध था। बलि ने सभी देवताओं को पराजित कर दिया था और स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था। यह बात देवताओं के लिए बहुत कठिनाई की थी। इसलिए, भगवान विष्णु ने एक योजना बनाई। उन्होंने वामन अवतार लिया, जो एक छोटे ब्राह्मण के रूप में प्रकट हुए।
वामन ने बलि से तीन पग भूमि मांगने का आग्रह किया। बलि, जो कि दानवीरों के लिए प्रसिद्द था, ने उसे बिना सोचे समझे अनुमति दे दी। वामन ने पहले पग में पूरी धरती, दूसरे पग में आकाश ले लिया और तीसरे पग के लिए बलि के सिर पर कदम रखा। इस प्रकार, बलि ने भगवान विष्णु के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।
लेकिन बलि का दिल बहुत बड़ा था। उन्होंने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि उन्हें अपने राज्य में लौटने की अनुमति दी जाए। भगवान विष्णु ने कहा कि उन्हें हर वर्ष एक बार अपने राज्य में आने की अनुमति होगी। इस दिन को बाली प्रतिपदा के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया।
बाली प्रतिपदा का दिन आता है, और बलि अपने राज्य, पाताल लोक से निकलकर धरती पर अपने भक्तों से मिलने के लिए आते हैं। लोग अपने घरों को सुंदर रोशनी से सजाते हैं और मिठाइयाँ बनाते हैं। इस दिन, लोग अपने पूर्वजों और बलि महाराज का स्वागत करते हैं।
एक छोटे से गांव में, जहाँ लोग इस दिन को खास तरीके से मनाते थे, एक वृद्ध महिला, दादी जी, हर साल अपने घर के दरवाजे पर रंगोली बनाती थीं। उन्होंने हमेशा यह कहा कि यह दिन उनके लिए खास होता है क्योंकि इस दिन बलि महाराज उनके घर आते हैं। दादी जी ने अपने पोते-पोतियों को हमेशा यह कहानी सुनाई कि बलि महाराज कितने दयालु और महान थे।
इस दिन, दादी जी ने अपने गांव के बच्चों को बुलाया और सबको रंगोली बनाने का तरीका सिखाया। उन्होंने बच्चों को बताया कि यह सिर्फ एक उत्सव नहीं है, बल्कि यह दिन हमें सिखाता है कि दया और कृपा का मूल्य क्या होता है। बलि महाराज का आगमन हम सभी को एकजुट करता है।
जब रात हुई, तो सभी ने अपने घरों के बाहर दीयों की कतारें लगा दीं। एकत्रित हुए लोग बलि महाराज का स्वागत करने के लिए तैयार थे। जैसे ही रात का अंधेरा छाया, सभी ने मिलकर बलि महाराज के स्वागत में गीत गाए।
सभी ने एक साथ मिलकर यह दिन मनाया, और दादी जी की आँखों में खुशी के आँसू थे। उन्होंने महसूस किया कि बाली प्रतिपदा केवल एक त्योहार नहीं है, बल्कि यह एक प्रेम और एकता का प्रतीक है। और इस तरह, हर साल बाली प्रतिपदा का पर्व गांव में धूमधाम से मनाया जाता है, बलि महाराज के आगमन के साथ।