AartiGyan | 03 February 2026
एक छोटे से गाँव में, जहाँ हर घर में त्योहारों का विशेष महत्व था, वहाँ एक साधारण परिवार रहता था। इस परिवार में माता-पिता और दो छोटे बच्चे थे। इस वर्ष, वरलक्ष्मी व्रतम का त्योहार आने वाला था, और माँ ने सोचा कि इस बार वह इसे पूरे श्रद्धा के साथ मनाएंगी।
माँ ने सुबह जल्दी उठकर स्नान किया और पूजा की तैयारी करने लगी। उसने घर को साफ किया और देवी लक्ष्मी के लिए एक सुंदर मंडप सजाया। मंडप में रंग-बिरंगे फूल, दीपक और मिठाइयाँ रखी गईं। बच्चों ने भी अपनी-अपनी छोटी-छोटी कलाकृतियाँ बनाई थीं, जिन्हें वे माँ के पूजन में शामिल करना चाहते थे।
जैसे-जैसे दिन चढ़ा, माँ ने पूजा की सभी सामग्रियाँ इकट्ठा कीं। उसने विशेष रूप से तैयार की गई 16 श्रृंगार की सामग्री का प्रयोग किया और लक्ष्मी माता की प्रतिमा को बड़े प्यार से सजाया। बच्चों ने भी इस काम में माँ का हाथ बंटाया।
पूजा के समय, माँ ने संकल्प लिया कि वह इस वर्ष वरलक्ष्मी व्रतम के दौरान लक्ष्मी माता से अपने परिवार की समृद्धि और खुशियों के लिए प्रार्थना करेंगी। उसने विशेष रूप से अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए भी माँ से आशीर्वाद माँगा।
जब पूजा का समय आया, तो माँ ने पूरे परिवार को बुलाया। सभी ने एक साथ मिलकर देवी लक्ष्मी की आरती की और मंत्रों का जाप किया। पूजा के दौरान, बच्चों ने देवी माँ के लिए मन से प्रार्थना की।
अचानक, पूजा के दौरान, बच्चों ने देखा कि एक अजीब सी रोशनी मंडप में फैलने लगी। उन्होंने देखा कि देवी लक्ष्मी की प्रतिमा से एक प्रकाश निकल रहा है। बच्चे डर गए, लेकिन माँ ने उन्हें समझाया कि यह देवी माँ का आशीर्वाद है।
वो प्रकाश धीरे-धीरे बढ़ता गया और उसे देखकर सभी ने आश्चर्य से देखा। तभी, एक आवाज आई, "मैं लक्ष्मी हूँ, जो तुम्हारे घर में सुख-शांति और समृद्धि लाने आई हूँ।"
परिवार को विश्वास नहीं हुआ, लेकिन माँ ने कहा, "यह देवी माँ का आशीर्वाद है। हमें हमेशा भक्ति और श्रद्धा से उनका ध्यान करना चाहिए।"
लक्ष्मी माता ने उन्हें कहा, "जो तुमने मेरी पूजा की है, उसके फलस्वरूप तुम्हारे घर में सुख और समृद्धि बनी रहेगी। लेकिन याद रखो, सच्ची भक्ति और प्रेम से भरा हृदय ही सच्चे सुख का दरवाजा खोलता है।"
इसके बाद, देवी माता ने उन्हें आशीर्वाद दिया और उस प्रकाश में धीरे-धीरे विलीन हो गईं। परिवार के सभी सदस्य खुशी से झूम उठे और एक-दूसरे को गले लगाने लगे। इस विशेष अनुभव ने उन्हें यह सिखाया कि भक्ति और प्रेम से किया गया कोई भी कार्य व्यर्थ नहीं जाता।
उस दिन के बाद, वरलक्ष्मी व्रतम उनके लिए केवल एक पूजा नहीं रह गया, बल्कि यह एक अद्भुत अनुभव बन गया। हर वर्ष वे इस दिन को विशेष तरीके से मनाने लगे, और लक्ष्मी माता के प्रति उनकी भक्ति और भी गहरी होती गई। इसने न केवल उनके परिवार को एकजुट किया, बल्कि उन्हें सच्चे सुख और समृद्धि का अनुभव भी कराया।