स्वामी विवेकानंद का नाम लेते ही मन में एक ऐसे सन्यासी की छवि उभरती है जिसकी आंखों में तेज और वाणी में सिंह जैसी गर्जना थी। 1863 में जन्मे नरेंद्रनाथ दत्त ने अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस के सानिध्य में वह ज्ञान प्राप्त किया, जिसने आगे चलकर भारत का गौरव बढ़ाया।
गुरु का मंत्र और समाज सेवा का संकल्प
जब नरेंद्र ने अपने गुरु से पूछा कि वह समाज के लिए क्या कर सकते हैं, तो गुरुदेव ने स्पष्ट कहा— "स्वयं को पहचानो।" यहीं से नरेंद्र के 'स्वामी विवेकानंद' बनने की यात्रा शुरू हुई। उनका मानना था कि नर सेवा ही नारायण सेवा है।
शिकागो की ऐतिहासिक यात्रा: संघर्ष और विजय
1893 की शिकागो विश्व धर्म महासभा में जाना विवेकानंद के लिए आसान नहीं था। संसाधनों के अभाव के बावजूद, उनके दृढ़ संकल्प ने उन्हें वहां पहुंचाया। मंच पर पहुंचते ही जब उन्होंने पूरी दुनिया को अपना परिवार मानकर संबोधित किया, तो वहां मौजूद हर व्यक्ति मंत्रमुग्ध हो गया।
युवाओं के लिए संदेश
विवेकानंद जी का मानना था कि धर्म का वास्तविक अर्थ मानवता की सेवा और एकता है। उन्होंने योग और भारतीय संस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाई। उनका जीवन सिखाता है कि आत्मविश्वास वह कुंजी है जिससे असंभव के ताले भी खुल जाते हैं।
निष्कर्ष
स्वामी विवेकानंद आज हमारे बीच शारीरिक रूप से नहीं हैं, लेकिन उनके विचार हर उस व्यक्ति के भीतर जीवित हैं जो समाज में बदलाव लाना चाहता है। उनका जीवन हमें याद दिलाता है कि हमारे भीतर असीमित शक्ति है, बस उसे जगाने की देर है।







