गाँव के किनारे एक छोटा सा खेत था, जहाँ एक गरीब किसान, रामू, अपने परिवार का पालन-पोषण करता था। रामू मेहनती और ईमानदार था, लेकिन उसकी किस्मत हमेशा उससे दूर रहती थी। वहीं, गाँव के दूसरे छोर पर एक अमीर जमींदार, रघुवीर, रहता था। रघुवीर के पास धन-दौलत की कोई कमी नहीं थी, परंतु वह स्वार्थी और निर्दयी था। एक दिन, रामू अपने खेत में काम कर रहा था, तभी अचानक बादल घेर आए। उसने अपना काम जल्दी-जल्दी खत्म करने की कोशिश की ताकि बारिश से पहले वह अपने घर पहुँच जाए। लेकिन रघुवीर ने देखा कि रामू के खेत में कुछ फसलें उसकी ज़मीन पर गिर गईं। उसने रामू को डाँटते हुए कहा, "तुम्हारी फसलें मेरी ज़मीन पर आ गई हैं, इन्हें यहाँ से हटाओ।
" रामू ने विनम्रता से कहा, "मालिक, यह केवल कुछ फसलें हैं, मैं इन्हें हटा दूँगा। कृपया मुझे बारिश से बचने का समय दें।" लेकिन रघुवीर ने उसकी बात नहीं मानी। उसने रामू पर गुस्सा निकालते हुए कहा, "तुम गरीब हो, तुम्हारी कोई अहमियत नहीं है। मुझे मेरी ज़मीन चाहिए।" रामू का दिल टूट गया। वह सोचने लगा कि कैसे एक आदमी अपनी अमीरी के घमंड में इतना अंधा हो सकता है। उसने अपने खेत को ठीक किया और घर चला गया। कुछ दिनों बाद, गाँव में एक बड़ा मेला लगा। रामू ने भी अपनी मेहनत से कुछ पैसे जमा किए और मेले में गया। वहाँ उसने देखा कि रघुवीर ने अपने धन का प्रदर्शन किया था, लोगों को दिखाने के लिए। उसने अपने धन से एक बड़ा तंबू सजाया था। रामू ने सोचा, "मैं भी अपने छोटे से काम से कुछ खुशी पा सकता हूँ।" उसने मेले में छोटे-मोटे सामान बेचे। अचानक, एक झूला टूट गया और रघुवीर के तंबू पर गिर गया। तंबू का सारा सामान बर्बाद हो गया और रघुवीर को भारी नुकसान हुआ।
लोग हंस रहे थे और रघुवीर के चेहरे पर चिंता थी। रामू ने देखा कि रघुवीर को अपनी अमीरी का कोई फायदा नहीं हो रहा है। उसने सोचा, "कभी-कभी, धन से ज्यादा महत्वपूर्ण है दया और मानवता।" कुछ दिनों बाद, गाँव में एक बाढ़ आ गई। रघुवीर की संपत्ति और खेत सब बर्बाद हो गए। लेकिन रामू ने अपनी बची-खुची फसल को बचाने के लिए अपने पड़ोसियों की मदद की। उसने अपनी फसलें साझा कीं और सबको भोजन दिया। समय के साथ, गाँव के लोगों ने रामू की ईमानदारी और दया की सराहना की। रघुवीर ने समझा कि उसकी स्वार्थीता ने उसे अकेला कर दिया था। एक दिन, रघुवीर ने रामू को बुलाया और कहा, "मुझे अपने कर्मों का फल समझ में आया। मैंने अपने धन को अपने अहंकार में बर्बाद किया। तुमने मुझे सिखाया है कि सच्चा धन दूसरों की मदद करने में है।" रामू ने मुस्कुराते हुए कहा, "कर्मों का फल हमेशा सामने आता है।"
इस तरह रघुवीर ने अपनी सोच बदली, और रामू के साथ मिलकर गाँव की भलाई के लिए काम करने लगा। गाँव ने फिर से खुशी का अनुभव किया, और यह सब एक छोटे से कर्म का फल था।







