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वैशाख चौथ की कथा | Vaisakh Chauth Ki Katha

चौथ माता की पूजा - हल्दी, कुमकुम, मेहन्दी, लच्छा, गुड़, का दीपक, पांच पीडिया और एक लड्डू गणेश जी का प्रसाद, चौथ मा का कसुंबल, पुष्प आदि पूजा में लेते हैं । पानी डालकर विनायक ॐ चौथ माता मांडकर पूजा करे, कहानी कहे रात को चन्द्रमा देखकर अरग
देकर जीमें ।


अरग देते समय बोलना- किसी भी चौथ के व्रत वास में चन्द्रमा को अरग देते समय बोलें - चांदा हेलो ऊगीयो, हरिया बांस कटाय, साजन ऊबा बारने, आखा पाती लाय, सोना की सी सांकली गले मोत्यां रो हार, चांद ने अरग देवता, जीवो वीर भरतार। (. के स्थान पर चारों बड़ी चौथ के नाम लेवे) 


वैसाख चौथ की कहानी- एक गाँव में सेठ, सेठानी थे । उनको एक बेटा और उसकी बहन थी । वह बरतन मांजकर पानी डालने नीचे जाती तो अड़ोस-पड़ोस की औरतें उससे पूछा आज खाने में क्या खाया। तो वह कहती, "बासी कुसी तर बासी ।" एक दिन जब वह बरतन मांज कर पानी फैकने गई तो रोजाना की तरह औरतों ने पूछा कि आज क्या खाया तो फिर उसने यही जवाब दिया "बासी कुसी तर बासी।" उस दिन सेठ के बेटे ने नीचे उतरते हुए उसकी यह बात सुनली और मन में सोचने लगा अभी तो यह ताजा भोजन करके आई है फिर भी इसने दूसरो को बासी कुरसी क्यों बताया । दूसरे दिन उसने माँ से कहकर खीर खाँड का भोजन बनवाया । माँ, बेटा और बहू तीनों ने बड़ी प्रसन्नता से भोजन किया । बहू बर्तन मांजकर पानी को नीचे डालने गई तो पीछे पीछे उसका आदमी भी गया । आज भी हमेशा की तरह औरतों ने पूछा आज क्या खाया तो उसने वहीं जवाब दिया "बासी कुर्सी तर बासी" । उसके आदमी को बहुत गुस्सा आया ? आज तो मेरे सामने खीर खाण्ड का भोजन किया है फिर भी यह बासी कुर्सी बता रही है । इसमें क्या रहस्य है इस बात को समझने के लिए वह रात का इंतजार करने लगा। जब रात हुई और यह कमरे में आई तो उसके आदमी ने पूछा की आज तूने खीर का भोजन किया फिर भी पड़ोसी औरतों को बासी कुसी क्यों बताया। तब बहू मुस्कराकर बोली की आपके दादा-परदादाओं की कमाई है, तो वह बासी कुसी हुई या नहीं । यह सुनकर उसने परदेश जाने की सोच ली तथा सुबह उठकर माँ से बोला माँ में कमाने के लिए परदेश जाऊँगा। माँ ने कहा अपने पास बहुत धन है । तुझे परदेश जाने की क्या आवश्यकता है । लेकिन बेटे के जिद करने पर माँ ने परदेश जाने की स्वीकृति दे दी । वह कमाने के लिए परदेश चला गया । वहाँ उसे एक सेठ के यहाँ नौकरी मिल गई, कुछ ही समय में वह सारा काम काज करने लग गया। सेठ अपना सारा कारोबार उसे सौंपकर स्वयं तीर्थ यात्रा करने चला गया। इधर सास ने यह से कह रखा था कि दीये की बुझावे तो चूल्हे की मत बझाना और चूल्हे की यूझ जावे तो दिये की मत बुझाना । लेकिन एक दिन दोनों अग्नि बुझ गई । तो बहु पड़ोस में अग्नि लेने गई उसने देखा कि वहाँ पड़ोस की औरतें किसी माता का पूजन कर रही है । यह देखकर उसने पूछा आप किस माता का पूजन कर रही हैं । मुझे भी बताओं कि यह किसका व्रत है तथा इसके करने से क्या फल होता है ? तो उनमे से एक बोली हम चौथ माता का व्रत व पूजन कर रही हैं । बिछुड़े का मिलन होता है, निपुत्री को पुत्र प्राप्त हो जाता है । इस पर बहु ने कहा कि मेरे भी पति को परदेश गये काफी समय हो गया है, मैं भी चौथ माता का व्रत करना चाहती हूँ । लेकिन मेरी सास मुझे बाहर आने ही नहीं देती तब मुझे कैसे पता लगेगा की चौथ कब है ? इस पर औरतों ने कहा कि तुम रोजाना एक डिबिया में गेहूं का दाना रखती जाना जिस दिन तीस दाने पूरे हो जावें उसी दिन व्रत रखके शाम को चौथ माता की पूजा करके चन्द्रमा को अर्घ्य देकर फिर खाना खा लेना । साहुकार की बहु कहे अनुसार व्रत करने लग गई व्रत करते करते काफी समय बीत गया । तो चौथ माता ने सोचा कि यदि इसकी नहीं सुनी अपने को कोई पूजा नहीं तब चौथ माता ने साहुकार के बेटे को सपने में जाकर कहा कि सरकार का बेटा सो रहा है या जाग रहा है । उसने कहा न सो रहा है न जाग रहा है चिन्ता में पड़ा है। इस पर चौथ माता ने कहा कि अब चिन्ता छोड़ और तेरे पर जा कर सब की सुध ले। उसने कहा कि मैं कैसे जाऊँ मेरा कारोबार बहुत फैला हुआ है । तब चौथ माता बोली सुबह उठकर नहा धोकर दुकान जा कर चौध बिन्दायक जी का नाम ले कर घी का दीपक जलाना तेरा सारा काम सुलझ जायेगा। सुबह उसने वैसा ही किया देखते-देखते ही सारा हिसाब किताब हो गया और में उसने घर जाने की तैयारी कर ली । घर को रवाना हुआ तो रास्ते एक साँप जा रहा था तो उसने साँप को सिसकार दिया। साँप ने गुस्से में आकर कहा कि मैं तो अपनी सो साल की उस पूरी करके मुक्ति पाने जा रहा था, तूने बाधा डाल दो, अब मैं तुझे डसँगा, इस पर साहुकार के बेटे ने कहा कि मैं बारह साल से मेरी माँ व पत्नी से मिलने जा रहा हैं, उनसे मिलने के बाद डस लेना । तब साँप बोला कि तू घर जाकर पंलग पर सो जायेगा तब उसने कहा कि मैं अपनी औरत की चोटी नीचे लटका दूंगा । उस पर चढ़ कर आ जाना । घर पहुंचा तो वह उदास था । बेटा कुछ बोला नहीं लेकिन उसकी औरत होशियार थी सब बात पता करके उसने कमरे की एक सीढ़ी पर दूध, दूसरी पर चूरमा, बालू रेत, इत्र, फूल आदि सात सीढ़ियों में सात वस्तु रख दी । आधी रात को फुफकारता हुआ सांप आया और सभी वस्तुओं का आनन्द लेकर खश हुआ लेकिन वचनों से बंधा हुआ था सो डासना तो था । चौध चिन्दायक जी ने सोचा कि इसकी रक्षा नहीं की तो कलयुग में अपने को कौन पूजेगा। चौथ माता तलवार बनी विन्दायक जी ढाल बने । और जैसे ही साँप डसने लगा तो उसे मार दिया । साहुकार के बेटे को नींद नहीं आ रही थी। साँप के मरते ही उसने अपनी पत्नी को उठाया और चौपड़ पासे खेलने लगा । सुबह देर तक बेटा बहु उठे नहीं तो माँ ने कहा बेटा तो धका आधा पर वह क्यों नहीं उठी । जाकर देखा तो खून ही खून हो रहा था उसने कहा मेरे बेटे बहू को किसी ने मार दिया । दब से बैट बोला मां हमारा वरी दुश्मन सर है, वहाँ राफाई करावो तक हम आयेंगे। माँ ने वहां सफाई करवाई वे बाहर आये।दो आकर मां से पूछा माँ मेरे पीछे से किसी ने कोई र् यक्या ? कि मैंने किया, इस पा सास ने कहा कि तूने क्या किया जुझ ैंसज च समय का खाना देती थी। वह बोली में महिने में एक हीथ का द्ृत थी। सुबह का खाना पानी वाली को देती दूसरी बार का गाय के बछडे को खिलाती तीसरी बार का ऊ्टीयाणा में गाड देती व दौथी बार का पूजा करके चन्द्रमा देखकर फिर खाती थी। मैंने पूजा के लिए बदिया की दुकान से घी गुड़ मंगवाया सो उसका जाकर हिसाब करी । सास ने पानी वाली से पूछा तो उसने कहा कि महिने में एक दिन मुझे ादेवी थी । बछड़े से पूछा तो उसके मुँह से फेफ के फूल गिरे । उटीयाणा खोदा तो रोटी के सोने के चक्कर निकले । बनिया से पूछा तो उसने भी कहा कि महीने में एक बार मेरे से घी गुड़ मंगवाती थी फिर दह ने कहा कि मुझे अब वैशाख की चौथ का उद्यापन करना है । सास बहु ने चौथ माता का व्रत व उद्यापन धूमधाम से किया और आराम से जीवन बिताया । हे चौथ माता उस पर प्रसन्न हुई जैसी सब पर प्रसन्न होता
और सभी की मनोकामना पूरी करना । अमर सुहाग देना।

विशेष :- कहानी सुनने के बाद चौथ माता के गीत ये।
 

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