कोकिला व्रत कथा एवं महत्व (Kokila Vrat Katha) एक बार दक्ष प्रजापति ने बहुत बड़ा यज्ञ किया. उस यज्ञ में समस्त देवताओं को आमंत्रित किया परन्तु अपने दामाद भगवान शंकर को आमंत्रित नहीं किया. यह बात जब सती को मालुम हुई तो उन्होंने भगवान शंकर से मायके जाने का आग्रह किया. शंकर जी ने बहुत समझाया बुझाया कि बिना आमंत्रण के न जाना चाहिए, किन्तु सती ने एक न सुनी और मायके चली गयी. मायके में सती का बहुत अपमान और अनादर हुआ, जिनकों सहन न कर सकने के कारण वे यज्ञ अग्नि में कूदकर सती हो गयी. उधर भगवान शंकर को जब यह खबर लगी तो उन्होंने क्रोधित होकर यज्ञ विध्वंश करने के लिए वीरभद्र नामक अपने गण को भेजा. वीरभद्र ने दक्षजी के यज्ञ को खंडित कर तमाम देवताओं को अंग भगं कर भगा दिया. इस विप्लव से आक्रांत होकर भगवान विष्णु शंकर जी के पास गये तथा देवों को पूर्ववत रूप में बनाने को कहा. इस पर भगवान पशुपति ने देवताओं का ज्यों का त्यों रूप तो दे दिया मगर आज्ञा उल्लघन करने वाली सती को क्षमा न कर सके. उन्हें दस हजार वर्ष तक कोकिला पक्षी बनकर विचरण करने के शाप दिया. सती (कोकिला) रूप में दस हजार वर्ष तक नन्दन बन में रही. तत्पश्चात पार्वती का जन्म पाकर. आषाढ़ में नियमित एक मास तक व्रत किया, जिसके परिणामस्वरूप भगवान शिव उनकों पतिरूप में मिले.