भगवान् कृष्ण बोले-हे युधिष्ठर ! अधिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम पद्मिनी है। इसमें मेरी और मेषी प्यारी वृषभानु दुलारी की तथा शिव पार्वती की पूजा की जाती है।

 

इसकी विधि यह है--दशमी के दिन मिथ्या भाषण निंदा आदि कुकर्मों का त्याग करें, रात्रि को भूमि पर शयन करें।

 

इसके महात्म्य की कथा पुलस्त्य ने नारद ऋषि को सुनाई थी। - त्रेता युग में एक महिष्मति नामक नगरी में कृतवीर्य नामक राजा राज्य करता था। उनकी सौ स्त्रियां थी, पुत्र एक भी न था पुत्र प्राप्ति के लिये पुत्रेष्ठी यज्ञादि अनेक उपाय किये परन्तु पुत्र उत्पन्न न हुआ । अन्त में यही विचार किया कि गन्ध मादान पर्वत पर जाकर तपस्या करूँ उसकी स्त्री राजा हरिश्चन्द्र की कन्या पद्मनी ने कहा में भी साथ चलूँगी पति पत्नी दोनों ने गंध मादान पर्वत पर जाकर दस हजार वर्ष तक तपस्या की परन्तु सिद्धि को प्राप्त न कर सके । राजा रानी दोनों का मांस सूख गया हड्डियों का पिंजरा रह गया। रानी ने विचार किया अब महा पतिव्रता अनुसुया की शरण में जाकर कोई और उपाय पूछूं, ऐसा विचार कर अत्रिमुनि की पत्नी अनुसुया के पास आई । दंडवत पूजा कर कहने लगी, में राजा हरिश्चन्द्र की पुत्री पद्मिनी हूँ। पति के साथ तपस्या करने आई थी, परन्तु दस हजार वर्ष व्यतीत हो गये भगवान रूठे ही रहे, पुत्र एक न दिया।

 

उनकी प्रसन्नता का उपाय कोई और बतलाओ, जिसके करने से हमारा कल्याण हो ! पतिव्रत परायणा पति अनुगामिनी रानी पदमिनी की बात सुनकर अनुसूया ने प्रसन्ता के साथ उत्तर दिए अधिक मलमास जो ३२ महीने पर आता है उसके शुक्ल पक्ष की एकादशी का विधि पूर्वक व्रत करो ऐसा अजेय पुत्र मिलेगा जिसको रावण भी विजय न कर सकेगा। अतः पद्मिनी रानी ने शुक्ल पक्ष की पद्मनी एकादशी का श्रद्धा से व्रत किया। और कीर्त्तवीर्य नामक पुत्र को प्राप्त किया। कीर्तवीर्य महाप्रतापी राजा था, देवता दैत्य सब उसकी प्रलय करते थे । रावण जैसों को विजय कर उसने अपनी जेल में बन्द कर दिया था पुलस्त्य मुनि के कहने से उसे छोड़ दिया था । जो मनुष्य उस विधि से भक्ति पूर्वक मलमास के शुक्ल पक्ष की पद्मनी का व्रत करते हैं । वे धन्य हैं तथा जो सम्पूर्ण कथा को पढ़ेंगे वे विष्णुलोक को जायें

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